Kabir Das Ka Jivan Parichay

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Kabir Das Ka Jivan Parichay: संत कबीर ने जिस झोपड़ी में होश संभाला वहा एक एक धागे को निर्दोष करने के बाद उस से कपडा बुनने की तान बुझती रहती थी फिर कबीर सूंदर कपडा बुनते बुनते साफ़ और सूंदर समाज की कल्पना कर बैठे और अपने आत्मा के अनुभव को सत्य प्रेम एकता और मानवता के रस में डुबोकर दोहो के रूप में बन दिया।

Kabir Das Ka Jivan Parichay

काशी का एक बुनकर था निरु वो अपनी पत्नी नीमा के साथ रात दिन सूत कपास ताना बाना में उलझा रहता था दोनों जन कमर तोड़ मेहनत कर रोटी के लिए पैसा कमाते पर गरीबी उनका पीछा नहीं छोड़ती उस से भी बड़ा दुःख ये था की उनका कोई बच्चा नहीं था, घर आँगन सूना सूना रहता।

हाट बाजार आते जाते समय नीरू लहर तारा तालाब के पास से गुजरता कभी दो घडी चैन की सांस लेने को वह बैठ भी जाता लेहरो से भरपूर तालाब को देख उससे अपनी जिंदगी का खलीपन कचोरने लगता, सोचता हे मालिक एक बच्चा घर में आ जाये तो ज़िंदगी खाली खाली सी न रहे।

एक रात गहरी नींद में नीरू ने सपना देखा वो लहर तारा तालाब के किनारे खड़ा है उस लहर के बिच एक नन्हा बलाक नीरू की तरफ बाहे उछालता है एक आवाज गूंजती है इससे गोद में उठा ले नीरू यही है तेरा बेटा, वो चौक कर नींद से उठ बैठा नीमा भी जाग गयी, नीरू ने अपना सपना नीमा को बताया तो पलभर के लिए उसके होंठो पर मुस्कान छा गयी, लेकिन फिर वो उदास हो गयी अगर उनकी किस्मत में ऐसा सुख होता तो वो उसके घर में कभी का आ गया होता।

पर एक दिन सपना सच हो ही गया नीरू और नीमा ने एक नवजात शिशु को पाया उसी लहर तारा तालाब के किनारे वही बच्चा था कबीर दोनों निहाल हो गए उन्होंने शिशु के बारे में किसी से जानने पूछने की जरुरत नहीं समझी। नीरू और नीमा के पास भरपूर प्यार था अपने नन्हे मुन्हे के लिए।

Kabir Das Short Biography in Hindi

नन्हा कबीर सूत और करघे के बिच मंडराता रहता था नीरू बुलाता तो उसके पास चला जाता और नीमा बुलाती तो उसकी तरफ मुड़ जाता वर्षो से वीरान पड़े उस जुलाहे के झोपड़े में अब खुशियों के फूल खिल गए थे

थोड़ा सा और बड़ा हुआ तो काटने बुनने में हाथ बटाने लगा निरु जब करघे पर बैठ साँचा तैयार करता तो बालक कबीर उस से वो सब कुछ सिखने पर ध्यान देता परन्तु किसी मदरसे में जाकर पढ़ने लिखने का मौका नहीं मिला उसे।

बनारस बड़ा तीर्थ स्थल तो था ही इसलिए वह साधु सन्यासिओ का जमघट लगा ही रहता था बालक कबीर को ये बाबा लोग पहले तो देखने लायक लगे किसी ने तो अपने बड़े बड़े उलझे बालो को लपेटकर बड़ा सा जुड़ा बनाकर अपने सर पर लपेटकर रखा हुआ है किसी ने बदन पर मिटटी लपेट ली है निरु और नीमा के बुलाते ही घर आ जाता। 

लेकिन उसके मन में आता क्यों न डमरू वाले बाबा को देख आउ वो मंजीरे वाले बाबा कितने मस्त होकर नाच रहे है उधर वो ढेर सरे साधु क्या बात कर रहे है निरु और नीमा हैरान थे की कबीर हाथ का काम छोड़कर कहा चला जाता है, धागे पर तो कभी कभी उसका हाथ ऐसे चलते है जैसे चादर कई बरसो में बुन्नी हो।

इसी तरह दिन बीतते रहे नीरू और नीमा ने कबीर की लापरवाही और बदलते व्यवहार को देखकर उसके काम की जिम्मेदारी को बढ़ाने का सोचा उन्होंने एक दीन सुबह सुबह कुछ तैयार कपडा कबीर को दिया की वो उसे बाजार में बेच आये सारा दिन बीत गया नीमा फ़िक्र करती रही।

Kabir Das Ka Jivan Parichay

कबीर रात को घर लौटा लेकिन खाली जेब नीमा ने पूछा कपडा कितने का बिका पैसे दे कबीर ने बोला कपडा बेचा ही नहीं था घाट पर कुछ जरूरतमंद लोग मिल गए उन्ही को दे आया, और फिर ये भी होने लगा की कबीर कई कई दिन घर न लौटता, वापस आने पर इस बात का जवाब न देता की कहा गया था।

 सीधे साधे माँ बाप परेशान थे की क्या करे उधर कबीर घूमता घूमता दूर निकल जाता था देखता मंदिरो में भीड़ लगी है मस्जिदों में नमाज पढ़ी जा रही है साधु संत भक्तो की भीड़ को ज्ञान का उदेश्य दे रहे है कबीर अपने मन में उभरे प्रश्नो के उत्तर ढूंढ रहा था कबीर के मन में नए विचार आ रहे थे जिस तरह और सब सोचते थे उस से अलग कभी कभी रात को घर से निकलता और चुप चाप गंगा के तट पर जा बैठता अँधेरे में अकेला।

एक दिन कबीर करघे पर काम कर रहा था नीरू भी साथ में लगा था एकदम से कबीर के मुँह से निकला लोग मंदिर मस्जिद क्यों जाते है नीरू ने उलझन में उसे कड़े स्वर में डाटा फालतू बात मत कर काम में मन लगा दिन गुजरते गए कबीर बदलता गया।

जो प्रश्न कबीर के मन में घुमते रहते थे उनका उत्तर उससे कही से न मिलता उसकी परेशानी बढ़ती जा रही थी साधुओ के बिच बैठा रहता पर उसे वह तसल्ली नहीं मिलती उन दिनों बनारस में गुरु रामानंद का बड़ा नाम था।

कबीर ने एक  से पूछा गुरु रामानंद कहा मिलेंगे मै उन्हें अपना गुरु बनाऊंगा लेकिन तू तो मुस्लमान है रामानंद तुझे अपना शिष्य कभी नहीं बनायंगे इस पर कबीर बोले मै कबीर हु मै न हिन्दू जो न मुस्लमान हु सवाल इंसानियत का है कोई भी समझा दे मुझे इंसान की तरह।

Kabir Das History in Hindi

कबीर ने अबतक गंगा किनारे की ठंडी ठंडी रेट पर घूम घूम कर पास की दुनिये में हर तरह के पाखंड अन्धविश्वास के साथ साथ झूटी कहानिओ का ढेर सुना था।

अंधविश्वासों के अन्धकार में साधु सन्यासी  भांग धतूरे के नशे में डूबे झूटी कहानिओ का प्रसार कर रहे है और लोग उन्हें सच मान रहे है किताबो और शास्त्रों की बातो से ताल ठोक ठोक कर अपने को महान बताने की होर लगी हुई थी, तंत्र मन्त्र और चमत्कारी गंडो पर लोगो से धन आभूषण की लूट करने वाले तांत्रिक मदिरा सेवन में डूबे है तीर्थो के चक्कर काटकर लोग धन लूटा रहे है और पाखंडी लोग उनसे जो लूटा जाये वो ऐंठ रहे है। असंख्य लोग भूक और बीमारी से क्यों तड़प रहे इन लोगो ने किस आधार पर अपने और दुसरो की जातीय तय कर रहे है, क्युकी जन्म तो सभी का माँ के पेट से ही होता है।

कबीर मन ही मन फैशला कर चूका था रामानंद को अपना गुरु बनाऊंगा उसने सुना था की गुरु रामानंद सुबह सुबह सूर्य निकलने से पहले गंगा किनारे स्नान करने जाते है बस फिर न जाने कबीर के मन में क्या सूझा वो सुबह सुबह अँधेरे में गंगा के घाट पर जाकर लेट गया।

रामानंद सीढिया चढ़ने लगे तो उनका पैर कबीर से टकराया उनके मुँह से निकला राम राम, गुरु रामानंद के मुख से निकले इन शब्दों से ही अपने जीवन की साक्थरता मानकर उन्हें सर माथे लगाया, लेकिन उसके राम निर्गुण थे जो मंदिरो में नहीं सबके मन में निवास करते थे अब उनका मन शांत और गंभीर था।

मोको कहाँ ढूंढें बन्दे,
मैं तो तेरे पास में ।
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना काबे कैलाश में

Kabir Das Short Biography in Hindi

Kabirdas Information in Hindi

एक दिन बाजार से घर आते समय नीरू बरसात में भीग गया था शर्दी लगने की वजह से तबियत बिगड़ती चली गयी घर में इलाज करवाने के लिए भी पैसे नहीं थे कबीर ने जी जान से पिता की सेवा की लेकिन नीरू चारपाई से उठ न सका।

नीमा ने आँसू भरी आँखों से कबीर से कहा जिनके जान जवान बच्चे होते है वो ऐसे बिना दवा या हाकिम के बिना नहीं मरते कबीरा तेरी लापरवाही ने उन्हें हमेशा चिंता में झुलाया।

Kabir Das Ka Jivan Parichay: कबीर भली भांति समझते थे माँ बाप के प्रति उनकी जो जिम्मेदारी थी वो उसे न निभा सके लेकिन उनका दोष तो बस ये था की उनके चारो और फैले झूट में सच की तलाश करते रहे है जगह जगह उसके बात कबीर ने करघा संभाल लिया मालिक का नाम लेकर और कबीर अब सुधर गया है।

अब कबीर कपडा बेचने बाजार जाते कुछ लोग कबीर को पहचानते भी थे वो सभी हैरान थे की फक्कड़ आवारा कबीर खरीद बेच में लगा है पाखण्डिओ ने जब उन्हें टोका तो उन्होंने बोला

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥
या
कबीर पाथर पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहार।
घर की चाकी कोउ न पूजै, जा पीस खाए संसार।।

Biography of Kabir Das in Hindi Pdf

 एक दिन एक बैरागी की मृत्यु होने पर साधु उसकी पाली हुई बेटी लोई को दिलासा देने उसके घर आ जा रहे है लोई उन सब को दूध पिने को दे रही थी कबीर भी वह मौजूद थे पर उन्होंने दूध पिने से मन कर दिया।

Biography of Kabir Das in Hindi Pdf

उन्होंने कहा की गंगा पार से कुछ साधु यहाँ आने वाले है दूध उनके लिए सुरक्षित रखे लोई को आश्चर्य हुआ की गंगा पार से कौन आएगा लेकिन थोड़ी ही देर में साधु आ गए इस प्रसंग से लोई को कबीर के सिद्ध मन का परिचय मिला।

अब लोई ने कबीर से विवाह करने का निश्चय लिया लोई अनाथ बालिका थी जिसे बैरागी ने पाला पोषा था लोई भी कबीर जैसी ही थी उनका विवाह कर नीमा को तसल्ली मिली की उसने अपने बेटे का घर बसा दिया है और इसके साथ साथ नीमा को उम्मीद थी की ग्रहस्ती के बंधन के कारण उसका फक्कड़ लापरवाह बेटा सुधर जायेगा।

लेकिन कबीर कहा बदलने वाले थे वो काम तो करघे पर करते लेकिन उनका मन अंदर ही अंदर उस ईश्वर का रूप ढूंढता रहता जो न मंदिर में था न मस्जिद में वो जो कण कण में समाया हुआ है और फिर एक दिन नीमा भी चल बसी। अब घर में रह गए कबीर और लोई।

कबीर बोले ईश्वर की कृपा से मुझे सरल चित्र माँ बाप मिले थे लेकिन अंत में एक दिन सभी को ईश्वर के पास जाना है उनके पीछे आसुओ और दुःख का ये संसार रह जाता है कबीर में व्यक्ति भाव बढ़ता ही जा रहा था।

स्त्री स्वाभाव से लोई ने कबीर का ध्यान काम की और बढ़ाना शुरू किया, कबीर के घर में एक बीटा आया कमाल और फिर एक बेटी आयी कमाली।

आँगन में बच्चो की किलकारियां तो गूंजती लेकिन गरीबी का असर काम न हुआ था क्युकी कबीर का मन कपडा बुनने के काम में नहीं लगता था इसके साथ साथ लोई का दुःख और बढ़ जाता जब कबीर के साथ हर दिन दो चार साधु और आ जाते, और उनका खाना पीना और ठहरना अक्सर बना ही रहता।

Kabir Das Story in Hindi

लेकिन अब लोई को ये सब सहन न था की जो घर में थोड़ा बोहोत है वो सब साधु सेवा में चला जाये और उसके  बच्चे भूके सोये कबीर पर घर की आपत्ति का कोई असर न होता।

पत्नी से प्रेम दीवाना कबीर कहता उस बड़े जुलाहे की और देखो जिसने संसार भर में अपना ताना बाना फैला रखा है अब मेरा एक ही काम है उसके नाम की धुन लगाउ और धुरी धुरी आपो आप  बहुराऊ।

अबतो लोई उनसे हार गयी वो भूके बच्चो को उनके सामने लाकर खड़ा कर देती और कहती की पेट भरने के लिए अब भिक्षा का सहारा ही लेना पड़ेगा लेकिन कबीर कहते अगर ईश्वर मेरे आन की रक्षा करे तो मै अपने बाप से भी भिक्षा न मांगू। मांगना और मरना एक है

वो ईश्वर से प्राथना करते हे प्रभु बचपन से ही मेरे आत्मा की लौ तुमसे लगी है तो ये केवल तुम्हारी कृपा के कारण है लेकिन हे भगवान भूखे पेट आपकी भक्ति नहीं हो सकती यदि तुम मुझे स्वयं कुछ नहीं दे सकते तो मै तुमसे मांग लेता हु

साँई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।।

एक दिन लोई घर के आभाव और बढ़ते बच्चो की चिंता में सो नहीं पा  रही थी कबीर ने उसे समझाया की मै जिस रास्ते पर चल दिया हु उस से लौटना मुश्किल है।

कबीर जहा भी जाते वहाँ लोगो में फैले अन्धविश्वास और धार्मिक पाखंड का विरोध करते सभी अपने मत संप्रदाय की बाते करते थे पर कबीर की बात किसी के समझ न आती कुछ उनकी बात सुनते कुछ उनका मज़ाक उड़ाते।

Kabir Das Jeevan Parichay in Hindi

लोई के कानो तक ये बात फ़ैल गयी की सब तरफ कबीर की चर्चा चल रही है हिन्दुओ और मुसलमानो दोनों में खलबली मची हुई थी की ये कबीर जो मंदिर और मस्जिद के पाखंड के बारे में कहता है ऐसा पहले तो किसी ने नहीं सोचा लोई के दर पर कबीर हस दिए और बोले मुझे कोई नहीं समझता।

 जाति-पातिपूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि के होई.

संत कबीर की राह बोहोत कठिन थी कदम कदम पर दुश्मन खड़े हो गए थे ये वो लोग थे जिनका लाभ केवल इस प्रथा पर था जिससे लोग गुमराह होते है

उन धार्मिक पाखण्डिओ ने कबीर की झोपडी में आग लगा दी उस समय कबिर वह नहीं थे कमाल कमली ने माँ लोई के साथ मिलकर आग बुझाई। उन दिनों सिकंदर लोदी दिल्ली के सिंघासन पर बैठा था उस तक पोह्ची शिकायतों के कारण कबीर को उसके सामने पेश होना पड़ा सिकंदर लोदी और उसके दरबार में उपस्तिथ लोगो ने शांत मुस्कुराते हुए कबीर को कातिल कहा और अपना गुस्सा उगला।

Kabir Das Ka Jivan Parichay: लेकिन साधु भाव से कबीर ने उत्तर दिया जो दुसरो का दुःख दर्द जान सकते है वही पीर होते है बाकी तो सब काफिर है। लेकिन सभी लोग उनके विरोधी नहीं थे पुरातन पंत की मान्यताओं में  जिन्होंने नुक्सान उठाया वो लोग तथा अंधविश्वासों के शिकार तीन तीन लोग उनके भक्त थे।

कबीर अपनी बात बेख़ौफ़ कहते लोगो को समझाते

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay

उधर हिन्दू मुस्लिम कट्टर पंथ भी चुप नहीं थे उनमे कोई कहता की ये नाश्तिक है मंदिर मस्जिद में कभी नहीं गया।

Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay

उम्र की नदी उच्चे निचे पड़ाव पार करके दूर चली आयी थी पूरे देश में उन्हें मानने वाले उनके दोहो कविताओं को अपने व्यवहार और प्राथ्नाओ में दोहराने लगे थे।

इसके साथ संत कबीर इस दुनिया में अपनी सरीर रुपी चादर छोड़ गए उनके अनुयायी हिंदी और मुसलमान दोनों थे कबीर का शव चादर से ढका हुआ था और दोनों तरफ के लोग आपसी विवाद में उलझे थे

हिन्दुओ का कहना था की वो उनका दाह संस्कार करेंगे और मुस्लमान शव दफ़न करना चाहते थे एकाएक वह फूलो की सुगंध फ़ैल गयी सब चौंक गए की सुगंध कहा से आ रही है।

तभी एक शिष्य ने कबिर के शव पर पड़ी चादर को हटा दिया सबकी आँखे फटी की फटी रह गयी वह उनके गुरु कबीर की जगह खुशबूदार फूलो का ढेर था फूलो की सुगंध कबीर का सन्देश दे रही थी आपसी भाईचारा सांप्रदायिक सदभाव हिन्दू और मुसलमानो ने कबीर के फूलो को बाट लिया संत कबीर ने मरकर भी समाज को नयी राह दिखाई।

आशा है आप सभी को संत कबीर के जीवन की कहानी पसंद आयी होगी इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करे निचे दिए बॉक्स में अपना ईमेल डालकर आप हमारी वेबसाइट को सब्सक्राइब कर सकते है जिसकी मदद से हमारी वेबसाइट पर नए लेख की सूचना आपको ईमेल द्वारा प्राप्त हो सके

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